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सहकारिता से ही संभव है आत्मनिर्भर भारत का निर्माण: के.डी.सी. एकेडमी में गूंजे सहकारिता के सिद्धांत

संपादक: Ghar Tak Express News | प्रकाशित: 06 Jul 2026, 06:03 PM
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लखनऊ। “संगठन में ही शक्ति है और सहयोग में ही प्रगति।” इसी मूलमंत्र को चरितार्थ करते हुए लखनऊ के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान के.डी.सी. अकादमी, मुझना विद्यालय में सहकारिता सप्ताह के उपलक्ष्य में एक भव्य और विचारोत्तेजक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। ४ जुलाई २०२६ को विद्यालय परिसर में “सहकारिता का महत्व एवं हमारे जीवन में इसकी भूमिका” विषय पर एक दिवसीय निबंध लेखन प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिसमें छात्रों ने न केवल अपनी लेखनी का जादू बिखेरा, बल्कि समाज को एक नई दिशा देने का संकल्प भी लिया।

वर्तमान दौर में जहाँ हर तरफ व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा की होड़ मची है, वहीं विद्यार्थियों को सामूहिक विकास और ‘एक सब के लिए, सब एक के लिए’ की भावना से परिचित कराने के उद्देश्य से यह आयोजन बेहद प्रासंगिक रहा। प्रतियोगिता में विद्यालय के कक्षा ६ से १२वीं तक के विद्यार्थियों ने अत्यंत उत्साहपूर्वक और बढ़-चढ़कर भाग लिया। छात्रों के चेहरों पर अपनी रचनात्मकता को कागज पर उतारने की उत्सुकता साफ देखी जा सकती थी।

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प्रधानाचार्य ने दिया आत्मनिर्भरता का मंत्र

कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ विद्यालय के प्रधानाचार्य महोदय द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ किया गया। इसके बाद उपस्थित छात्र-छात्राओं और शिक्षक वर्ग को संबोधित करते हुए प्रधानाचार्य ने सहकारिता की महत्ता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने अपने प्रेरक उद्बोधन में कहा, “सहकारिता केवल एक आर्थिक मॉडल या शब्द नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन जीने की पद्धति है। जब हम मिलकर काम करते हैं, तो बड़े से बड़े लक्ष्य को भी आसानी से हासिल किया जा सकता है।” उन्होंने आगे कहा कि सहकारिता ही हमारे समाज के समग्र विकास और प्रधानमंत्री के ‘आत्मनिर्भर भारत’ के सपने को साकार करने की असली आधारशिला है। दैनिक जीवन में सहयोग और सामूहिक कार्य की भावना को अपनाकर ही हम एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।

मुख्य अतिथि ने साझा किए सहकारिता के वैश्विक और ग्रामीण आयाम

इस गरिमामयी कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में ‘भारतीय बीज सहकारी समिति लिमिटेड’ (BBSSL), लखनऊ के जोनल कोऑर्डिनेटर श्री अजय कुमार तिवारी उपस्थित रहे। उन्होंने विद्यार्थियों के साथ अपने गहरे अनुभव साझा किए और बहुत ही सरल शब्दों में सहकारिता के इतिहास, उसकी उत्पत्ति तथा मूल सिद्धांतों से बच्चों को अवगत कराया।

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श्री अजय कुमार तिवारी ने भारत के ग्रामीण और कृषि परिदृश्य का जिक्र करते हुए कहा, “हमारा देश गांवों में बसता है और ग्रामीण व कृषि विकास में सहकारी संस्थाओं की भूमिका रीढ़ की हड्डी जैसी है। अमूल और इफको जैसी संस्थाएं इस बात का जीता-जागता उदाहरण हैं कि कैसे आम लोग मिलकर वैश्विक स्तर पर क्रांति ला सकते हैं।” उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रहें, बल्कि सहयोग, सहभागिता, पारदर्शिता और सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना को अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएं।

कागज पर उतरी सहकारिता की परिभाषा, विजेता हुए सम्मानित

संबोधनों के बाद निबंध प्रतियोगिता की शुरुआत हुई। लगभग एक घंटे तक चले इस सत्र में विद्यार्थियों ने देश में सहकारिता के बदलते स्वरूप, महिलाओं के सशक्तिकरण में दुग्ध सहकारी समितियों के योगदान और दैनिक जीवन में आपसी सहयोग जैसे बिंदुओं पर बेहद उत्कृष्ट और मौलिक विचार लिखे। बच्चों के निबंधों में समाज को बदलने की छटपटाहट और देश के विकास में योगदान देने का जज्बा साफ झलक रहा था।

प्रतियोगिता के मूल्यांकन के बाद, सबसे उत्कृष्ट और प्रभावशाली विचार प्रस्तुत करने वाले शीर्ष पाँच विद्यार्थियों का चयन किया गया। मुख्य अतिथि और प्रधानाचार्य ने संयुक्त रूप से इन होनहारों को प्रशस्ति-पत्र (Certificate) और स्मृति-चिह्न (Memento) प्रदान कर सम्मानित किया। पुरस्कार पाकर विजेताओं के चेहरे खिल उठे। इसके साथ ही, मंच से प्रतियोगिता में भाग लेने वाले प्रत्येक प्रतिभागी की सक्रियता और उनके प्रयास की खुले दिल से सराहना की गई, जिससे बच्चों का मनोबल दोगुना हो गया।

राष्ट्र निर्माण के संकल्प के साथ समापन

कार्यक्रम का समापन विद्यालय के वरिष्ठ शिक्षक द्वारा दिए गए धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने मुख्य अतिथि श्री अजय कुमार तिवारी का आभार व्यक्त किया कि उन्होंने अपने व्यस्त समय में से बच्चों के मार्गदर्शन के लिए वक्त निकाला। समग्र रूप से यह आयोजन विद्यार्थियों के लिए अत्यंत प्रेरणादायक और ज्ञानवर्धक सिद्ध हुआ।

कार्यक्रम के अंत में सभी छात्र-छात्राओं और अध्यापकों ने सहकारिता के महत्व को आत्मसात करते हुए समाज के पिछड़े और जरूरतमंद वर्गों को साथ लेकर चलने तथा राष्ट्र के सतत विकास में अपनी सकारात्मक भूमिका निभाने का सामूहिक संकल्प लिया। परीक्षा और किताबों के दबाव से इतर, इस तरह के आयोजन बच्चों को एक संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनाने में मील का पत्थर साबित होते हैं।