नई दिल्ली, 14 सितंबर 2026: हिमालय क्षेत्र में तेजी से हो रहा ग्लेशियर पिघलाव अब केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं रह गया है, बल्कि आने वाले दशकों में पानी की उपलब्धता, कृषि, ऊर्जा और करोड़ों लोगों की आजीविका पर असर डालने वाला जोखिम बनता जा रहा है। 14 सितंबर को जारी एक नई रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ की ओर बढ़ रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार ग्लेशियरों के पीछे हटने की रफ्तार बढ़ रही है और कई नदी घाटियां भविष्य में ‘पीक वाटर’ की स्थिति की ओर बढ़ सकती हैं। इसका अर्थ है कि शुरुआती दौर में बर्फ और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से नदियों में पानी बढ़ सकता है, लेकिन एक सीमा के बाद ग्लेशियरों का भंडार घटने के कारण नदी प्रवाह में कमी शुरू हो सकती है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है हिमालय
हिमालय की नदियां भारत सहित दक्षिण एशिया के बड़े हिस्से के लिए पेयजल, सिंचाई और जलविद्युत का महत्वपूर्ण आधार हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का असर आर्थिक गतिविधियों तक पहुंच सकता है और भारत की अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से पर अप्रत्यक्ष दबाव डाल सकता है।
विशेष चिंता ग्लेशियल झीलों को लेकर भी है। रिपोर्ट में भारत में लगभग 200 उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों का उल्लेख किया गया है, जिनमें 56 को बहुत उच्च जोखिम वाली श्रेणी में बताया गया है। ऐसी झीलों के कमजोर प्राकृतिक बांध टूटने पर अचानक बाढ़, भूस्खलन और निचले इलाकों में भारी तबाही का खतरा बढ़ सकता है।
नेपाल-तिब्बत सीमा की हालिया आपदा ने बढ़ाई चिंता
यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब अगस्त के अंत में नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में ग्लेशियर से जुड़ी विनाशकारी घटना के बाद अचानक बाढ़ और भूस्खलन से बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ। इस आपदा ने हिमालयी क्षेत्रों में निगरानी, पूर्व चेतावनी व्यवस्था और आपदा तैयारी की जरूरत को फिर सामने ला दिया है।
निगरानी व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत
विशेषज्ञों के मुताबिक हिमालय क्षेत्र में मौजूद हजारों ग्लेशियरों में से केवल एक छोटे हिस्से की नियमित निगरानी हो पाती है। ऐसे में उपग्रह निगरानी, ग्लेशियर और झीलों की मैपिंग, नदी प्रवाह की रियल-टाइम निगरानी तथा स्थानीय समुदायों तक समय पर चेतावनी पहुंचाने वाली व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है।
रिपोर्ट का संदेश यह है कि हिमालय में बदलाव को केवल दूरस्थ पर्यावरणीय समस्या मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। पानी, बिजली, खेती, सड़क और बस्तियों की योजना में भविष्य के जलवायु जोखिमों को शामिल करना अब नीति-निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बन चुका है।
स्रोत: Reuters की 14 सितंबर 2026 की रिपोर्ट में Systemiq और सहयोगी पर्यावरण संगठनों की रिपोर्ट के आधार पर हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर पिघलाव, ‘पीक वाटर’ और ग्लेशियल झीलों के जोखिम को रेखांकित किया गया है।