नई दिल्ली: मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर फिर तेज हुआ है। 14 सितंबर 2026 को कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया। सऊदी अरब के अहम ईस्ट-वेस्ट तेल पाइपलाइन ढांचे पर हुए हमलों और क्षेत्र में जहाजों पर हमलों के बाद बाजार में आपूर्ति बाधित होने की आशंका बढ़ी है।
Reuters के अनुसार, सोमवार को ब्रेंट क्रूड वायदा एक समय 4.5 प्रतिशत तक चढ़कर 109.29 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जबकि अमेरिकी WTI भी 4 प्रतिशत से अधिक मजबूत हुआ। यह तेजी केवल एक देश की सप्लाई चिंता तक सीमित नहीं है; निवेशक इस बात को लेकर सतर्क हैं कि मध्य पूर्व में संघर्ष लंबा खिंचने पर तेल की उपलब्धता, परिवहन लागत और वैश्विक महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।
सऊदी तेल ढांचे पर हमले का असर
सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन देश के तेल निर्यात ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हालिया हमलों के बाद इसके संचालन में बाधा आई है। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रभावित हिस्से को पूरी क्षमता से बहाल होने में कई सप्ताह लग सकते हैं। इससे एशिया और यूरोप के लिए उपलब्ध कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर बाजार की चिंता बढ़ी है।
रेड सी और बाब अल-मंदब में भी बढ़ा दबाव
इसी दौरान यमन के हूती बलों की लाल सागर क्षेत्र में गतिविधियां भी बढ़ी हैं। Associated Press के अनुसार, हूतियों ने ग्रेटर और लेसर हनीश द्वीपों पर कब्जे का दावा किया है, जिससे बाब अल-मंदब के आसपास समुद्री सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ गई है। यह इलाका एशिया, यूरोप और मध्य पूर्व के बीच महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है।
समुद्री मार्गों पर जोखिम बढ़ने की स्थिति में जहाजों को लंबा वैकल्पिक रास्ता अपनाना पड़ सकता है। इसका असर केवल तेल पर नहीं, बल्कि माल ढुलाई, बीमा और अन्य आयात-निर्यात लागत पर भी पड़ सकता है।
भारत पर क्या असर पड़ सकता है?
भारत दुनिया के बड़े कच्चा तेल आयातकों में शामिल है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में लंबे समय तक तेल महंगा रहने पर देश के आयात बिल और घरेलू ईंधन कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, किसी भी तत्काल घरेलू पेट्रोल-डीजल मूल्य बदलाव का अनुमान केवल अंतरराष्ट्रीय कीमत देखकर लगाना उचित नहीं होगा, क्योंकि इसमें रुपये की विनिमय दर, सरकारी नीतियां, कर और तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण व्यवस्था जैसे कई कारक शामिल होते हैं।
बाजार की नजर आगे के घटनाक्रम पर
निवेशकों की नजर अब मध्य पूर्व में सैन्य घटनाक्रम, सऊदी तेल ढांचे की बहाली और प्रमुख समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर है। यदि आपूर्ति बाधित होने का जोखिम बढ़ता है, तो तेल की कीमतों में और अस्थिरता आ सकती है। दूसरी ओर, यदि प्रभावित ढांचा जल्दी बहाल होता है और समुद्री परिवहन सामान्य होता है, तो बाजार पर दबाव कुछ कम हो सकता है।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी से इतना स्पष्ट है कि मध्य पूर्व का संघर्ष अब ऊर्जा बाजार के लिए भी बड़ा जोखिम बन गया है। भारत समेत तेल आयात पर निर्भर देशों के लिए आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों और समुद्री परिवहन की स्थिति पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।
स्रोत: Reuters, Associated Press. यह रिपोर्ट उपलब्ध सत्यापित सूचनाओं के आधार पर स्वतंत्र रूप से तैयार की गई है।