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ईरान-अमेरिका तनाव का असर: कच्चा तेल चढ़ा तो भारतीय शेयर बाजार पर दबाव, Nifty-Sensex फिसले

संपादक: Arvind Kumar Sahani |प्रकाशित: 01 सितम्बर 2026, 05:02 अपराह्न
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ईरान-अमेरिका तनाव का असर: कच्चा तेल चढ़ा तो भारतीय शेयर बाजार पर दबाव, Nifty-Sensex फिसले

नई दिल्ली, 1 सितंबर 2026: मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े सैन्य तनाव का असर मंगलवार को वैश्विक वित्तीय बाजारों के साथ भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखाई दिया। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और वैश्विक बॉन्ड यील्ड बढ़ने से निवेशकों में महंगाई तथा ब्याज दरों को लेकर चिंता बढ़ी। शुरुआती कारोबार में Nifty 50 करीब 0.1 प्रतिशत नीचे 24,055.8 पर था, जबकि BSE Sensex 0.02 प्रतिशत की मामूली गिरावट के साथ 76,944.28 के आसपास रहा।

Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, बैंकिंग और ऑटो शेयरों में दबाव अपेक्षाकृत अधिक रहा। बैंक इंडेक्स लगभग 1.1 प्रतिशत और ऑटो इंडेक्स करीब 1.2 प्रतिशत नीचे था। छोटे और मझोले शेयरों के सूचकांकों में भी कमजोरी दर्ज की गई। बाजार की दिशा पर घरेलू आर्थिक आंकड़ों के साथ अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम का असर बना हुआ है।

कच्चे तेल की कीमतें 92 डॉलर के पार

अमेरिका-ईरान संघर्ष के फिर तेज होने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी है। Brent crude मंगलवार को करीब 2 प्रतिशत चढ़कर 92 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचा। तेल की कीमतों में तेजी भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि महंगा कच्चा तेल आयात बिल, मुद्रास्फीति और कंपनियों की लागत पर दबाव डाल सकता है।

हालांकि बाजार में हर तेजी का सीधा असर उपभोक्ता कीमतों पर तुरंत नहीं पड़ता। इसका प्रभाव तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत, रुपये की विनिमय दर, सरकारी कर-व्यवस्था और घरेलू ईंधन मूल्य निर्धारण जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है। इसलिए मौजूदा तेल उछाल को लेकर आगे के कारोबारी सत्रों में भी निगरानी जरूरी होगी।

कुछ शेयरों में अलग रुख

व्यापक बाजार दबाव के बावजूद कुछ बड़े शेयरों में तेजी रही। Reuters के अनुसार Reliance Industries करीब 2.5 प्रतिशत ऊपर रही, जबकि Kotak Mahindra Bank में CEO succession से जुड़ी खबर के बाद करीब 1.3 प्रतिशत की बढ़त देखी गई। दूसरी ओर Maruti Suzuki के शेयर लगभग 4.4 प्रतिशत टूटे। Happiest Minds में भी तेज गिरावट रही, जबकि ITC के शेयरों में बढ़त दर्ज हुई।

भारत की GDP वृद्धि ने दिया सहारा

बाजार के लिए सकारात्मक पक्ष यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था ने अप्रैल-जून तिमाही में 7.8 प्रतिशत की सालाना वृद्धि दर्ज की है। यह मजबूत वृद्धि घरेलू अर्थव्यवस्था की क्षमता को दर्शाती है, लेकिन वैश्विक ऊर्जा कीमतों और वित्तीय परिस्थितियों में बदलाव से बाजार धारणा पर अल्पकालिक दबाव बना रह सकता है।

निवेशकों के लिए फिलहाल दो बड़े बाहरी संकेत महत्वपूर्ण हैं—मध्य पूर्व की स्थिति और वैश्विक ब्याज दरों का रुख। यदि तेल कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं और महंगाई की चिंता बढ़ती है, तो दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों की मौद्रिक नीति पर भी इसका असर पड़ सकता है।

स्रोत: Reuters की 1 सितंबर 2026 की बाजार रिपोर्ट।

फोटो क्रेडिट: Ameya Khandekar/Unsplash. तस्वीर सांकेतिक है।