काठमांडू। मानसून के मौसम में लगातार बढ़ रही सर्पदंश (सांप के काटने) की घटनाओं और उससे होने वाली मौतों को कम करने के उद्देश्य से संबंधित सरकारी संस्थाओं, स्वास्थ्य विशेषज्ञों, आपदा प्रबंधन एजेंसियों तथा अन्य साझेदार संगठनों के प्रतिनिधियों की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक में सांप के काटने से होने वाली जान-माल की क्षति, ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ते जोखिम, समय पर उपचार की उपलब्धता, स्वास्थ्य सेवाओं की तैयारी तथा जनजागरूकता बढ़ाने जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई।
विशेषज्ञों ने कहा कि अधिकांश मौतें समय पर उचित उपचार न मिलने, अंधविश्वास, प्राथमिक उपचार की जानकारी के अभाव तथा अस्पताल तक देर से पहुंचने के कारण होती हैं। यदि समुदाय स्तर पर जागरूकता अभियान चलाया जाए, स्वास्थ्यकर्मियों को नियमित प्रशिक्षण दिया जाए और प्रत्येक जिले में उपचार केंद्रों की स्पष्ट जानकारी उपलब्ध कराई जाए तो सर्पदंश से होने वाली मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी ला जा सकती है। बैठक में उपलब्ध कराए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, बैसाख 1 से श्रावण 21 तक देश के 64 जिलों में सांप के काटने की 768 घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें 56 लोगों की मौत हुई जबकि 719 लोग घायल हुए। आंकड़ों के अनुसार कंचनपुर जिला सर्पदंश की घटनाओं के मामले में सबसे अधिक प्रभावित जिला रहा।

मानसून शुरू होते ही देश के तराई, मैदानी तथा ग्रामीण इलाकों में सांपों की गतिविधियां बढ़ जाती हैं। खेतों, घरों, झाड़ियों, जलभराव वाले क्षेत्रों तथा खुले स्थानों में रहने वाले लोगों के सामने सर्पदंश का खतरा अधिक रहता है। इसी बढ़ते जोखिम को देखते हुए आयोजित बैठक में विभिन्न मंत्रालयों, स्वास्थ्य विभाग, आपदा प्रबंधन इकाइयों, चिकित्सकों, विशेषज्ञों और विकास साझेदार संस्थाओं ने भाग लिया। बैठक के दौरान इस बात पर चिंता व्यक्त की गई कि हर वर्ष मानसून के दौरान बड़ी संख्या में लोग सांप के काटने का शिकार होते हैं। इनमें किसान, मजदूर, बच्चे और ग्रामीण महिलाएं सबसे अधिक प्रभावित होती हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि अधिकांश मामलों में यदि मरीज को पहले एक घंटे के भीतर उचित चिकित्सा सुविधा मिल जाए तो उसकी जान बचाई जा सकती है। प्रतिनिधियों ने यह भी कहा कि कई क्षेत्रों में लोग अभी भी झाड़-फूंक, टोना-टोटका और पारंपरिक उपचार पर निर्भर रहते हैं, जिससे मरीज की स्थिति गंभीर हो जाती है। इसलिए वैज्ञानिक उपचार और अस्पताल आधारित चिकित्सा को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।

बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, बैसाख 1 से श्रावण 21 तक देशभर के 64 जिलों में कुल 768 सर्पदंश की घटनाएं सामने आईं। इनमें 56 लोगों की मौत हुई जबकि 719 लोग घायल हुए। विशेषज्ञों ने कहा कि वास्तविक संख्या इससे अधिक भी हो सकती है क्योंकि कई ग्रामीण क्षेत्रों में सभी घटनाएं आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हो पातीं। विशेष रूप से कंचनपुर जिला में सबसे अधिक सर्पदंश की घटनाएं दर्ज की गईं। इसके अलावा कई अन्य तराई जिलों में भी मानसून के दौरान मामलों में वृद्धि देखी गई।
स्वास्थ्य अधिकारियों ने बताया कि खेतों में काम करने वाले किसान, वर्षा के दौरान घरों में घुस आने वाले सांप, जलभराव और खुले स्थानों में रहने वाले परिवार सबसे अधिक जोखिम में रहते हैं। रात के समय बिना रोशनी के बाहर निकलना भी सर्पदंश का बड़ा कारण माना गया। बैठक में इस बात पर भी चर्चा हुई कि ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त मात्रा में एंटी-स्नेक वेनम (Anti Snake Venom) उपलब्ध कराया जाना चाहिए ताकि गंभीर मरीजों को तत्काल उपचार मिल सके। विशेषज्ञों ने सर्पदंश की घटनाओं को कम करने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि सबसे पहले जनजागरूकता अभियान को व्यापक स्तर पर चलाया जाना चाहिए। विद्यालयों, पंचायतों, सामुदायिक संगठनों तथा स्थानीय निकायों के माध्यम से लोगों को यह बताया जाए कि सांप के काटने पर क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।

बैठक में यह भी सुझाव दिया गया कि:
स्वास्थ्यकर्मियों को नियमित प्रशिक्षण दिया जाए।
प्रत्येक स्वास्थ्य केंद्र में एंटी-वेनम की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
एम्बुलेंस सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाया जाए।
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराए जाएं।
दूरदराज के गांवों में स्वास्थ्य स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित किया जाए।
आपातकालीन हेल्पलाइन को मजबूत किया जाए।
उपचार केंद्रों की सूची सार्वजनिक की जाए।
विशेषज्ञों ने कहा कि लोगों को यह समझाना अत्यंत आवश्यक है कि सांप के काटने के बाद मरीज को शांत रखें प्रभावित अंग को कम से कम हिलाएं और जितनी जल्दी संभव हो अस्पताल पहुंचाएं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मरीज को झाड़-फूंक कराने, घाव को काटने, जहर चूसने, बर्फ लगाने या कसकर रस्सी बांधने जैसी गलत विधियों से बचना चाहिए क्योंकि इससे स्थिति और गंभीर हो सकती है।

बैठक में मौजूद प्रतिनिधियों ने कहा कि सर्पदंश केवल स्वास्थ्य समस्या नहीं बल्कि एक सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। इसे नियंत्रित करने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय, स्थानीय सरकार, शिक्षा विभाग, आपदा प्रबंधन एजेंसियों, स्वयंसेवी संगठनों तथा समुदायों के बीच समन्वय आवश्यक है। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि मानसून शुरू होने से पहले प्रत्येक वर्ष विशेष जागरूकता अभियान चलाया जाए। रेडियो, टेलीविजन, सोशल मीडिया, विद्यालयों तथा स्थानीय सभाओं के माध्यम से लोगों तक सही जानकारी पहुंचाई जाए। इसके साथ ही गांवों में झाड़ियों की नियमित सफाई, घरों के आसपास जलभराव रोकने, अनाज को सुरक्षित रखने, रात में टॉर्च का उपयोग करने, खेतों में ऊंचे जूते पहनने तथा बच्चों को सुरक्षित स्थानों पर खेलने की सलाह देने पर भी जोर दिया गया। बैठक में यह भी कहा गया कि यदि सरकार, स्वास्थ्य संस्थाएं और स्थानीय समुदाय मिलकर कार्य करें तो आने वाले वर्षों में सर्पदंश से होने वाली मौतों में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। समय पर उपचार, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी और जागरूक नागरिक इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
Report :GT Express
