नई दिल्ली, 25 जुलाई। भारत ने स्वच्छ, सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल रेल परिवहन की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए अपनी पहली हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेन के सफल परिचालन से विश्व के सामने नई तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन किया है। 17 जुलाई 2026 को दिल्ली क्षेत्र के जींद–सोनीपत रेलखंड पर हरी झंडी दिखाकर रवाना की गई यह अत्याधुनिक ट्रेन अब तक 1,200 किलोमीटर से अधिक की सफल यात्रा पूरी कर चुकी है। इस दौरान 3,200 लीटर से अधिक डीज़ल की बचत दर्ज की गई, जो भारतीय रेल की हरित ऊर्जा नीति और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के प्रयासों की बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
भारतीय रेल द्वारा विकसित यह परियोजना पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित है। इस उपलब्धि ने न केवल भारत को स्वच्छ रेल प्रणोदन तकनीक अपनाने वाले चुनिंदा देशों की श्रेणी में ला खड़ा किया है, बल्कि भविष्य में ग्रीन हाइड्रोजन आधारित परिवहन व्यवस्था को बढ़ावा देने की दिशा में भी एक मजबूत आधार तैयार किया है।

हरित ऊर्जा की ओर ऐतिहासिक कदम
17 जुलाई 2026 भारतीय रेल के इतिहास में एक स्वर्णिम दिन के रूप में दर्ज हो गया। इसी दिन भारत की पहली हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेन को जींद–सोनीपत रेलखंड पर औपचारिक रूप से रवाना किया गया। लगभग एक सप्ताह के भीतर ट्रेन ने 1,200 किलोमीटर से अधिक की सफल यात्रा पूरी करते हुए अपनी तकनीकी क्षमता, विश्वसनीयता और दक्षता को प्रमाणित कर दिया। इस सफल संचालन से 3,200 लीटर से अधिक डीज़ल की बचत हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में इसी प्रकार की ट्रेनों का व्यापक स्तर पर संचालन शुरू होता है, तो भारतीय रेल हर वर्ष करोड़ों लीटर डीज़ल की बचत कर सकती है। इससे न केवल विदेशी मुद्रा की बचत होगी बल्कि पर्यावरण प्रदूषण में भी उल्लेखनीय कमी आएगी। भारतीय रेल का लक्ष्य आने वाले वर्षों में अधिकाधिक डीज़ल चालित ट्रेनों को हरित ऊर्जा आधारित प्रणालियों में परिवर्तित करना है। हाइड्रोजन ट्रेन उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग और उपलब्धि है।
कैसे काम करती है हाइड्रोजन ट्रेन
हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेन की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कार्यप्रणाली है। यह ट्रेन हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच होने वाली विद्युत-रासायनिक अभिक्रिया (Electrochemical Reaction) के माध्यम से स्वयं बिजली उत्पन्न करती है। फ्यूल सेल के भीतर हाइड्रोजन गैस ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया करती है, जिससे विद्युत ऊर्जा उत्पन्न होती है। यही ऊर्जा ट्रेन के मोटरों को संचालित करती है। इस पूरी प्रक्रिया में किसी प्रकार का धुआँ या कार्बन डाइऑक्साइड नहीं निकलती। उप-उत्पाद के रूप में केवल जलवाष्प (Water Vapour) निकलती है। यही कारण है कि इसे वर्तमान समय की सबसे स्वच्छ रेल प्रणोदन तकनीकों में शामिल किया जाता है। पारंपरिक डीज़ल इंजन जहाँ बड़ी मात्रा में कार्बन उत्सर्जित करते हैं, वहीं हाइड्रोजन ट्रेन शून्य-उत्सर्जन (Zero Emission) तकनीक पर आधारित है। इस तकनीक के कारण वायु प्रदूषण में कमी आती है तथा जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने में भी सहायता मिलती है।
पूरी तरह स्वदेशी तकनीक पर आधारित परियोजना
भारतीय रेल द्वारा विकसित यह परियोजना “आत्मनिर्भर भारत” अभियान की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है। 10 कोच वाली इस ट्रेन में दो हाइड्रोजन ड्राइविंग पावर कार लगाई गई हैं। दोनों मिलकर कुल 2,400 किलोवाट शक्ति उत्पन्न करती हैं। इसके अतिरिक्त ट्रेन में अत्याधुनिक लिथियम आयरन फॉस्फेट (LiFePO₄) बैटरियाँ लगाई गई हैं, जो ऊर्जा के कुशल प्रबंधन में सहायता करती हैं। ट्रेन में उच्च क्षमता वाले हाइड्रोजन सिलेंडर लगाए गए हैं जिनसे फ्यूल सेल को निरंतर ईंधन उपलब्ध कराया जाता है। आधुनिक ऊर्जा प्रबंधन प्रणाली के कारण ट्रेन आवश्यकता अनुसार बैटरी तथा फ्यूल सेल दोनों से ऊर्जा प्राप्त करती है, जिससे दक्षता बढ़ती है तथा ऊर्जा की बर्बादी कम होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस परियोजना में भारतीय इंजीनियरों, वैज्ञानिकों तथा रेलवे के तकनीकी विशेषज्ञों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अधिकांश तकनीकी समाधान देश में ही विकसित किए गए हैं।

जींद में स्थापित हुई देश की पहली हाइड्रोजन सुविधा
इस परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हरियाणा के जींद में स्थापित भारत की पहली समर्पित हाइड्रोजन भंडारण एवं ईंधन भरने की सुविधा है। यहाँ लगभग 3,000 किलोग्राम ग्रीन हाइड्रोजन के भंडारण की व्यवस्था की गई है। भंडारण के लिए 500 Bar तक के उच्च दाब वाले टैंक लगाए गए हैं जबकि ट्रेन में 350 Bar के दबाव पर सुरक्षित रूप से ईंधन भरने की सुविधा उपलब्ध है। यह आधुनिक स्टेशन अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों के अनुरूप बनाया गया है। भविष्य में यदि देश के अन्य रेलमार्गों पर भी हाइड्रोजन ट्रेनें संचालित की जाती हैं तो इसी प्रकार के हाइड्रोजन स्टेशन विभिन्न राज्यों में स्थापित किए जाएंगे। रेल मंत्रालय का मानना है कि ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन एवं वितरण का मजबूत नेटवर्क विकसित होने के साथ-साथ इस तकनीक की लागत में भी उल्लेखनीय कमी आएगी।
Report : GT Express
