जनजातीय गौरव दिवस पर गुजरात के डेडियापाड़ा में भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा पर श्रद्धासुमन अर्पित

भगवान बिरसा मुंडा का योगदान
भगवान बिरसा मुंडा भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक ऐसी शख्सियत हैं जिनकी वीरता नेतृत्व और जनसमर्थन ने अंग्रेजी शासन की जड़ों को हिला दिया था। वे न सिर्फ एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे बल्कि आदिवासी समुदायों के अधिकारों उनकी पहचान और उनके अस्तित्व की रक्षा के लिए भी खड़े रहे। उनकी सोच काम और संघर्ष ने जनजातीय समाज को एक नई दिशा दी। उनका जनजागरण अभियान उलगुलान अंग्रेजों के खिलाफ एक बड़ा विद्रोह साबित हुआ और उन्होंने यह सिद्ध किया कि आदिवासी समाज अपनी अस्मिता और अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित होकर लड़ सकता है।
आज भी उनका बलिदान देश की हर पीढ़ी को प्रेरणा देता है।
डेडियापाड़ा में श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन
डेडियापाड़ा जो जनजातीय आबादी वाला इलाका है वहां जनजातीय गौरव दिवस पर एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा पर पुष्पांजलि दी गई और उनके जीवन पर प्रकाश डाला गया। स्थानीय आदिवासी कलाकारों ने पारंपरिक नृत्य और गीतों के माध्यम से सांस्कृतिक प्रस्तुति दी जिसने लोगों को उनके इतिहास से सीधे जोड़ने का काम किया। इस मौके पर आम जनता को भगवान बिरसा मुंडा के योगदान से अवगत कराने के लिए प्रदर्शनी और जानकारीपूर्ण पैनल भी लगाए गए। बच्चों और युवाओं को उनके जीवन से संबंधित कहानियों के माध्यम से समझाया गया कि उन्होंने किस तरह आदिवासी समाज के हितों के लिए संघर्ष किया।
जनजातीय गौरव दिवस का महत्व
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2021 में 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में घोषित किया था। इसका उद्देश्य पूरे देश को जनजातीय समुदायों की संस्कृति परंपराओं और उनके ऐतिहासिक योगदान के बारे में जागरूक करना है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि भारत की विविधता में जनजातीय समुदायों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। उनकी परंपराएं उनकी कला और उनका प्रकृति से जुड़ा जीवन देश की विरासत का अनमोल हिस्सा है।
गुजरात में जनजातीय विकास पर फोकस
गुजरात सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा स्वास्थ्य, सड़क और रोजगार के अवसर बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया है। डेडियापाड़ा, नर्मदा, दाहोद और तापी जैसे जिलों में कई योजनाएं शुरू की गई हैं जिनसे स्थानीय लोगों को सीधा फायदा मिल रहा है। जनजातीय गौरव दिवस के मौके पर भी इन विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाने और उन्हें तेज गति देने का आश्वासन दिया गया।

आदिवासी समाज की सांस्कृतिक सम्पन्नता को मिली नई पहचान
कार्यक्रम में शामिल विभिन्न वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समाज की प्राकृतिक ज्ञान प्रणाली पर्यावरण संरक्षण की परंपरा और समुदाय आधारित जीवनशैली आज पूरे देश के लिए प्रेरक है। बिरसा मुंडा जैसे महानायक ने इन्हीं मूल्यों को बचाने और आगे बढ़ाने का प्रयास किया था। आज आधुनिक भारत में भी उनकी सोच प्रासंगिक है क्योंकि वे स्थानीय संसाधनों की रक्षा और समाज को आत्मनिर्भर बनाने की वकालत करते थे।
युवा पीढ़ी में बढ़ रही रुचि
डेडियापाड़ा में आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में युवा उपस्थित थे। उनमें से कई ने कहा कि वे भगवान बिरसा मुंडा के जीवन पर आधारित पुस्तकों फिल्मों और विचारों के बारे में जान रहे हैं और उन्हें प्रेरणा मिल रही है कि संघर्ष कैसा भी हो अगर इरादा मजबूत हो तो बदलाव संभव है। युवा पीढ़ी में यह जागरूकता बताती है कि जनजातीय गौरव दिवस सिर्फ एक समारोह नहीं बल्कि सांस्कृतिक चेतना और इतिहास की पुनर्स्थापना का अभियान बन चुका है।
1. जनजातीय गौरव दिवस कब मनाया जाता है?
जनजातीय गौरव दिवस हर साल 15 नवंबर को मनाया जाता है। यह दिन भगवान बिरसा मुंडा की जयंती के अवसर पर जनजातीय समाज के योगदान को सम्मान देने के लिए समर्पित है।
2. जनजातीय गौरव दिवस मनाने का उद्देश्य क्या है?
इस दिन का उद्देश्य आदिवासी समुदायों की संस्कृति, परंपराओं, इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। इसके साथ ही समाज में उनकी पहचान और अधिकारों को मजबूत करना भी इसका प्रमुख लक्ष्य है।


