जयंती

अभय समाज पार्टी के द्वारा वीरांगना फूलन देवी जयंती पर ‘मतदाता पेंशन’ का शंखनाद: 10 अगस्त को कौवा ठोर में जुटेगी आवाम,

संवादाताः मुकेश साहनी‚घर तक एक्सप्रेस।

अभय समाज पार्टी के राष्ट्रिय अध्यक्ष मा. शत्रुधन सिंह निषाद ने 10 अगस्त 2025 को मुजुरी पनियरा रोड पर स्थित कौवा ठोर के श्रीराम जानकी मैरेज हॉल में वीरांगना फूलन देवी की जयंती के अवसर पर एक विशाल कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। यह आयोजन केवल श्रद्धांजलि अर्पित करने तक सीमित नहीं है; इसका मुख्य उद्देश्य एक क्रांतिकारी विचार को जन-आंदोलन में बदलना है – ‘मतदाता पेंशन’। आयोजकों ने स्पष्ट रूप से घोषणा की है कि देश के हर मतदाता को, जो लोकतंत्र के इस महायज्ञ में अपनी वोट रूपी आहुति देता है, उसे न्यूनतम ₹15,000 प्रति माह की पेंशन मिलनी चाहिए। यह मांग उस गहरे सवाल से उपजी है जो दशकों से अनकहा था: यदि 5 साल सेवा करने वाले सांसद और विधायक आजीवन पेंशन के हकदार हो सकते हैं, तो जीवन भर मतदान करने वाले नागरिक को आर्थिक सुरक्षा क्यों नहीं मिलनी चाहिए?

वीरांगना फूलन देवी: प्रेरणा का स्रोत

इस कार्यक्रम के लिए वीरांगना फूलन देवी की जयंती का चयन अत्यंत प्रतीकात्मक और महत्वपूर्ण है। फूलन देवी का जीवन अन्याय, शोषण और सामाजिक असमानता के खिलाफ एक अनवरत संघर्ष का पर्याय है। उन्होंने दबे-कुचले और शोषित समाज के अधिकारों के लिए हथियार उठाए और व्यवस्था को चुनौती दी। उनका संघर्ष केवल व्यक्तिगत प्रतिशोध का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और हिस्सेदारी की लड़ाई का प्रतीक था।

आयोजकों का मानना है कि आज देश का आम नागरिक, विशेषकर मतदाता, एक अलग तरह के शोषण का शिकार है। उसे 5 वर्षों में एक बार ‘राजा’ या ‘मालिक’ कहकर सम्मानित तो किया जाता है, लेकिन चुनाव खत्म होते ही उसे उसी लाचार व्यवस्था के हवाले कर दिया जाता है। देश के संसाधनों और संपत्ति पर उसका कोई प्रत्यक्ष अधिकार नहीं रह जाता। फूलन देवी ने जिस तरह अपने हक और सम्मान के लिए लड़ाई लड़ी, उसी तरह आज देश के मतदाताओं को अपने आर्थिक अधिकारों और राष्ट्र की संपत्ति में अपनी हिस्सेदारी के लिए एकजुट होने की प्रेरणा देने हेतु इस दिन को चुना गया है। यह आयोजन फूलन देवी की विद्रोही चेतना को एक नई दिशा देने का प्रयास है – जो अब बंदूक से नहीं, बल्कि वोट की ताकत और संगठित मांग से लड़ी जाएगी।

‘मतदाता पेंशन’ का तर्क: क्यों और कैसे?

इस आंदोलन का केंद्रीय स्तंभ ‘मतदाता पेंशन’ की मांग है, जिसे आयोजक एक खैरात या सब्सिडी के रूप में नहीं, बल्कि मतदाता के ‘अधिकार’ के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके पीछे का तर्क सीधा और शक्तिशाली है:

  1. प्रतिनिधियों और मतदाताओं में समानता का सिद्धांत: तर्क यह है कि एक सांसद या विधायक 5 साल के कार्यकाल के बाद आजीवन पेंशन, स्वास्थ्य सुविधाओं और अन्य भत्तों का हकदार हो जाता है। इसके विपरीत, एक आम नागरिक, जो 18 वर्ष की आयु से लेकर मृत्यु तक लगभग हर चुनाव में मतदान करके लोकतंत्र को जीवित रखता है, उसे बुढ़ापे में या आर्थिक तंगी के समय कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती। यह एक स्पष्ट विरोधाभास और अन्याय है। यदि जनप्रतिनिधि ‘जनता के सेवक’ हैं, तो मालिक (जनता) को सेवक से कम अधिकार कैसे मिल सकते हैं?
  2. लोकतंत्र में भागीदारी का सम्मान: मतदान केवल एक राजनीतिक कृत्य नहीं है, यह राष्ट्र निर्माण में नागरिक की सबसे महत्वपूर्ण भागीदारी है। ‘मतदाता पेंशन’ इस भागीदारी को सीधे तौर पर सम्मानित और पुरस्कृत करने का एक माध्यम होगी। इससे न केवल मतदान प्रतिशत में वृद्धि होगी, बल्कि नागरिक अपने वोट की कीमत को आर्थिक रूप से भी महसूस कर सकेंगे।
  3. आर्थिक न्याय और संपत्ति का पुनर्वितरण: आयोजकों का दावा है कि राष्ट्र की संपत्ति और संसाधन कुछ गिने-चुने पूंजीपतियों और राजनेताओं के हाथों में केंद्रित हो गए हैं। देश की जीडीपी बढ़ रही है, लेकिन उसका लाभ आम आदमी तक नहीं पहुँच रहा है। ‘मतदाता पेंशन’ इस आर्थिक खाई को पाटने का एक सीधा तरीका हो सकता है। हर महीने ₹15,000 की राशि सीधे नागरिकों के खाते में जाने से ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्था में तरलता बढ़ेगी, क्रय शक्ति में वृद्धि होगी और छोटे व्यवसायों को बढ़ावा मिलेगा। यह ‘ट्रिकल-डाउन’ इकोनॉमी के विफल मॉडल के बजाय ‘बॉटम-अप’ दृष्टिकोण को सशक्त करेगा।

एकजुटता का आह्वान: जाति और धर्म से ऊपर उठकर

इस आयोजन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक इसका समावेशी दृष्टिकोण है। आयोजक बार-बार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि यह मुद्दा किसी एक जाति, समुदाय या धर्म का नहीं है। मतदाता की कोई जाति नहीं होती; उसका एकमात्र परिचय ‘भारत का नागरिक’ है। गरीबी, बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा हर समुदाय के लोगों को प्रभावित करती है।

यह कार्यक्रम एक मंच प्रदान करेगा जहाँ सभी धर्मों और जातियों के लोग अपनी साझा समस्याओं के लिए एक साझा समाधान पर चर्चा करने के लिए एकत्रित होंगे। यह उस राजनीति को सीधी चुनौती है जो समाज को जाति और धर्म के नाम पर बांटकर अपना हित साधती है। ‘मतदाता पेंशन’ का नारा एक ऐसा unifying call है जो हर उस व्यक्ति को जोड़ सकता है जो महसूस करता है कि व्यवस्था ने उसके साथ न्याय नहीं किया है। यह राष्ट्र की संपत्ति में आम आदमी की हिस्सेदारी का मुद्दा है, और इसलिए यह विशुद्ध रूप से राष्ट्रहित का मुद्दा है।कार्ययोजना तैयार करना है।

कार्यक्रम आयोजन मण्डल

मा.डा.घनश्याम निषाद (रा0 उपाध्यक्ष अ.स.पा.)‚ ओमप्रकाश निषाद (प्र.अ.अ. स.पा.)‚ मा. गनेश साहनी (जिलाध्यक्ष)‚ मा. राम सुमेर निषाद (समाज सेवी)‚ मा. फौजदार निषाद (रा. सचिव)‚ मा. महेन्दर निषाद‚ मा. राजेश निषाद‚ मा. कन्हैया सिंह निषाद‚ मा. जितई निषाद‚ मा. ज्वाहिर निषाद‚ मा. जितई साहनी‚ मा. सिददू निषाद‚ मा. नेबू लाल निषाद‚ मा. सुरेश निषाद (एडवोकेट)‚ मा.रज्जाक शेख‚ मा. बरकत अली अंसारी‚ मा. मुन्ना निषाद‚ मा. नित्या नन्द निषाद

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