संपादकः मुकेश साहनी घर तक एक्सप्रेस न्युज। भारत के वैज्ञानिकों ने पार्किंसंस रोग (Parkinson’s Disease – PD) का प्रारंभिक चरण में पता लगाने के लिए नैनो प्रौद्योगिकी पर आधारित एक नई विधि विकसित की है। मोहाली स्थित नैनो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान के शोधकर्ताओं ने एक स्वर्ण नैनोक्लस्टर (Gold Nanocluster – AuNCs) आधारित बायोसेंसर तैयार किया है जो रोग से जुड़े प्रोटीन के खतरनाक रूपों की पहचान कर सकता है। यह खोज उस समय आई है जब भारत सहित पूरी दुनिया तेजी से बढ़ते इस तंत्रिका संबंधी रोग से निपटने के लिए नई तकनीकों की तलाश में है | पार्किंसंस रोग दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ते न्यूरोडिजेनरेटिव विकारों में से एक है। भारत में भी जैसे-जैसे बुजुर्ग आबादी बढ़ रही है और जीवन प्रत्याशा लंबी हो रही है, वैसे-वैसे पीडी के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। आज भी अधिकतर मामलों का पता तभी चलता है जब मस्तिष्क में गंभीर तंत्रिका क्षय पहले ही हो चुका होता है। ऐसे में यह बायोसेंसर समय से पहले रोग की पहचान में मदद करेगा और मरीजों को शीघ्र उपचार और बेहतर जीवन गुणवत्ता प्रदान कर सकता है।
शोधकर्ताओं ने इस सेंसर को विकसित करने के लिए α-सिन्यूक्लिन नामक प्रोटीन पर ध्यान केंद्रित किया। यह प्रोटीन सामान्य अवस्था में हानिरहित होता है, लेकिन समय के साथ यह विषाक्त रूपों में बदलकर मस्तिष्क कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाता है। INST की टीम ने पाया कि यदि इस प्रोटीन की सतह पर मौजूद आवेश परिवर्तन को मापा जाए तो रोग के प्रारंभिक संकेत पकड़ में आ सकते हैं। इसके लिए उन्होंने स्वर्ण नैनोक्लस्टर्स को अलग-अलग अमीनो अम्लों (Proline और Histidine) से लेपित किया। प्रोलाइन-लेपित क्लस्टर्स ने प्रोटीन के सामान्य रूप को पहचाना, जबकि हिस्टिडीन-लेपित क्लस्टर्स ने विषाक्त रूपों को पकड़ लिया। इस तकनीक को परखने के लिए शोधकर्ताओं ने आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों का सहारा लिया। यूवी-विज़ स्पेक्ट्रोस्कोपी, इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (TEM), एक्स-रे फोटोइलेक्ट्रॉन स्पेक्ट्रोस्कोपी (XPS) और प्रतिदीप्ति इमेजिंग जैसी विधियों से नैनोक्लस्टर्स का अध्ययन किया गया। प्रोटीन और नैनोक्लस्टर्स के बीच की अंतःक्रिया को समझने के लिए जेल इलेक्ट्रोफोरेसिस, चक्रीय वोल्टमेट्री और इम्पीडेंस स्पेक्ट्रोस्कोपी का प्रयोग किया गया। अंततः इस प्रणाली को मानव-व्युत्पन्न न्यूरोब्लास्टोमा कोशिकाओं में जांचा गया और यह सुरक्षित तथा प्रभावी पाई गई।
पार्किंसंस रोग
पार्किंसंस रोग एक प्रगतिशील तंत्रिका संबंधी विकार है जो मुख्य रूप से शरीर की गति, संतुलन और मांसपेशी नियंत्रण को प्रभावित करता है। इस बीमारी में मस्तिष्क में डोपामिन नामक न्यूरोट्रांसमीटर का स्तर धीरे-धीरे घटने लगता है। डोपामिन की कमी से व्यक्ति को कंपन (tremors), मांसपेशियों में जकड़न, संतुलन बिगड़ना और धीरे-धीरे बोलने तथा चलने जैसी कठिनाइयाँ होने लगती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, विश्वभर में लाखों लोग पीडी से प्रभावित हैं और आने वाले दशकों में यह संख्या कई गुना बढ़ सकती है। भारत में भी पीडी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं क्योंकि आबादी का एक बड़ा हिस्सा बुजुर्ग वर्ग की ओर बढ़ रहा है। अब तक पार्किंसंस का कोई पूर्ण इलाज उपलब्ध नहीं है, केवल दवाओं और थेरेपी के माध्यम से लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है।
प्रारंभिक पहचान और समय पर हस्तक्षेप से रोग की प्रगति को धीमा किया जा सकता है और मरीजों की जीवन गुणवत्ता बेहतर बनाई जा सकती है। INST का नवाचार (Innovation by INST, Mohali) मोहाली स्थित नैनो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (Institute of Nano Science and Technology – INST) ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। इस शोध का नेतृत्व डॉ. शर्मिष्ठा सिन्हा ने किया, जो संस्थान में वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं। उनके साथ उनकी पीएचडी छात्राएँ सुश्री हरप्रीत कौर और सुश्री इशानी शर्मा ने सक्रिय योगदान दिया। इसके अलावा, इस परियोजना में CSIR-IMTECH, चंडीगढ़ के वैज्ञानिकों डॉ. दीपक शर्मा और अर्पित त्यागी का भी सहयोग मिला, जिन्होंने प्रोटीन बायोकेमिस्ट्री और कोशिका-आधारित परीक्षण में अपनी विशेषज्ञता दी। INST का यह नवाचार एक इंटरडिसिप्लिनरी टीम वर्क का उदाहरण है जिसमें युवा शोधकर्ताओं और अनुभवी वैज्ञानिकों की संयुक्त मेहनत शामिल है। इस नई खोज का आधार गोल्ड नैनोक्लस्टर्स (AuNCs) हैं – ये कुछ नैनोमीटर आकार के अत्यंत सूक्ष्म, चमकदार कण होते हैं।
शोधकर्ताओं ने इन नैनोक्लस्टर्स को अमीनो अम्लों (Proline और Histidine) से लेपित किया। प्रोलाइन-लेपित नैनोक्लस्टर्स ने प्रोटीन के सामान्य (हानिरहित) रूप को पहचाना, जबकि हिस्टिडीन-लेपित नैनोक्लस्टर्स ने प्रोटीन के विषाक्त (टॉक्सिक) रूप को पकड़ लिया। इस प्रणाली से α-सिन्यूक्लिन प्रोटीन के विभिन्न रूपों में अंतर किया जा सकता है, जो पार्किंसंस रोग की उत्पत्ति से सीधे जुड़े हुए हैं। तकनीक का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह सुरक्षित, प्रभावी और कम लागत वाली है। इसे भविष्य में पॉइंट-ऑफ-केयर टेस्टिंग (Point-of-Care Testing) में इस्तेमाल किया जा सकता है, यानी मरीज का परीक्षण सीधे क्लिनिक या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर किया जा सकेगा। भविष्य की संभावनाएँ (Future Prospects) INST द्वारा विकसित यह तकनीक केवल पार्किंसंस रोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अन्य तंत्रिका संबंधी विकारों में भी उपयोगी हो सकती है।
विशेष रूप से, यह प्रणाली अल्ज़ाइमर रोग जैसी बीमारियों की पहचान में भी सहायक सिद्ध हो सकती है, जो प्रोटीन के गलत तरीके से मुड़ने से जुड़ी होती हैं। इस सेंसर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह लेबल-फ्री (label-free) है, यानी इसमें किसी अतिरिक्त रासायनिक मार्कर या टैग की आवश्यकता नहीं होती। इससे परीक्षण सरल और तेज़ हो जाता है। यह तकनीक चिकित्सकीय दृष्टि से अनुकूलनीय (clinically adaptable) है, यानी इसे अस्पतालों और डायग्नोस्टिक केंद्रों में बिना बड़े बदलावों के उपयोग में लाया जा सकता है। यदि इसे बड़े पैमाने पर अपनाया गया तो यह स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ने वाले आर्थिक और संरचनात्मक बोझ को काफी हद तक कम कर सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्रणाली रोग की प्रारंभिक पहचान (early diagnosis) सुनिश्चित करेगी, जिससे मरीजों को समय रहते इलाज मिलेगा और रोग की प्रगति धीमी की जा सकेगी।
Source : PIB | रिपोर्ट : मुकेश साहनी : GT Express न्यूज़ डेस्क |
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