भारत में दवाओं की कीमत
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भारत में दवाओं की कीमतों पर सख्त नियंत्रण एनपीपीए की कार्रवाई

संवादाताः मुकेश साहनी‚घर तक एक्सप्रेस। भारत में दवाओं की कीमतें अब मधुमेह और हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं के अधिकतम मूल्य तय कर दिए हैं। इस कदम से मरीजों को हर साल अरबों रुपये की बचत हो रही है। डीपीसीओ, 2013 के अनुसार, अनुसूचित दवाओं की अधिकतम कीमत हर साल 1 अप्रैल को पिछले वित्त वर्ष के थोक मूल्य सूचकांक (सभी वस्तुएं) के आधार पर संशोधित की जाती है। सभी निर्माता, आयातक और विपणक अपने उत्पादों को निर्धारित अधिकतम मूल्य और लागू स्थानीय करों के भीतर बेचने के लिए बाध्य हैं। इसके साथ ही, एनपीपीए नई दवाओं की खुदरा कीमतें भी तय करता है और असाधारण परिस्थितियों में गैर-अनुसूचित दवाओं के दाम पर भी नियंत्रण कर सकता है।

14 जुलाई 2025 तक, एनपीपीए ने 930 अनुसूचित दवाओं के दाम तय कर दिए हैं, जिनमें 131 कैंसर रोधी, 11 मधुमेह रोधी और 66 हृदय रोग से संबंधित दवाएं शामिल हैं। राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची (एनएलईएम), 2022 के तहत इन दवाओं की कीमतों के निर्धारण या पुनर्निर्धारण से औसत कीमत में लगभग 17% की कमी आई है। इससे मरीजों को लगभग ₹3,788 करोड़ की अनुमानित वार्षिक बचत हो रही है इसके अतिरिक्त, अब तक 3,482 नई दवाओं के खुदरा मूल्य निर्धारित किए गए हैं, जिनमें से 1,924 दवाएं मधुमेह, कैंसर और हृदय रोग से संबंधित हैं। इन सभी को तय खुदरा मूल्य के भीतर बेचना कंपनियों के लिए अनिवार्य है। साथ ही, 22 मधुमेह और 84 हृदय रोग की गैर-अनुसूचित दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य पर भी सीमा तय की गई है, जिससे मरीजों को लगभग ₹350 करोड़ की सालाना बचत हुई है।

एनपीपीए ने 42 गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं के व्यापार मार्जिन पर भी सीमा लगा दी है। इसके परिणामस्वरूप 526 ब्रांड की कीमतें औसतन लगभग 50% कम हो गई हैं। अनुमान है कि इस कदम से मरीजों को लगभग ₹984 करोड़ की वार्षिक बचत होगी। गैर-अनुसूचित दवाओं के लिए भी निर्माताओं को एमआरपी में सालाना 10% से अधिक वृद्धि की अनुमति नहीं है। एनपीपीए पर सभी दवाओं के तय मूल्य की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है। वहीं, दवाओं की सूची और कीमत तय करने में स्थायी राष्ट्रीय औषधि समिति (एसएनसीएम) की अहम भूमिका है, जो समय-समय पर चिकित्सीय वर्ग की औषधियों की सुरक्षा, प्रभावकारिता, उपलब्धता और सामर्थ्य का मूल्यांकन करती है।

औषधि सूची

एसएनसीएम, डब्ल्यूएचओ की आवश्यक औषधि सूची, राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों, भारतीय फार्माकोपिया और राष्ट्रीय फार्मूलरी के आधार पर औषधियों को एनएलईएम में शामिल करने की सिफारिश करती है। रोगों की व्यापकता, उपचार के तरीकों में बदलाव, नई औषधियों की उपलब्धता और अस्वीकार्य जोखिम-लाभ प्रोफाइल को ध्यान में रखते हुए यह सूची समय-समय पर अपडेट होती है। सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के लिए केंद्र सरकार प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना भी चला रही है। इस योजना के तहत 2,110 दवाएं और 315 शल्य चिकित्सा व चिकित्सा उपकरण उपलब्ध हैं, जो सभी प्रमुख चिकित्सीय समूहों को कवर करते हैं। प्रयोगशाला अभिकर्मकों और टीकों को छोड़कर, एनएलईएम में शामिल लगभग सभी जेनेरिक दवाएं इस योजना में उपलब्ध हैं।

इस योजना की जानकारी आमजन तक पहुंचाने के लिए भारतीय औषधि एवं चिकित्सा उपकरण ब्यूरो लगातार अभियान चला रहा है। विज्ञापन, रेडियो, टीवी, मोबाइल ऐप, सिनेमा, होर्डिंग, बस ब्रांडिंग, सोशल मीडिया और जन औषधि दिवस (7 मार्च) जैसे आयोजनों के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जा रहा है | 30 जून 2025 तक, पूरे देश में 16,912 जन औषधि केंद्र (जेएके) खोले जा चुके हैं, जिनमें तमिलनाडु राज में 1,432 केंद्र शामिल हैं। यहां करूर में 20, डिंडीगुल में 40, तिरुचिरापल्ली में 71 और पुदुकोट्टई में 32 जन औषधि केंद्र संचालित हैं।

अधिक शुल्क वसूले

एनपीपीए ने पिछले पांच वर्षों (1 अप्रैल 2020 से 31 मार्च 2025) में अधिक शुल्क वसूले जाने के 436 मामले दर्ज किए हैं और कंपनियों से ₹133.19 करोड़ की राशि वसूली है। इन मामलों में डिमांड नोटिस जारी किए गए हैं और विस्तृत सूची एनपीपीए की वेबसाइट पर उपलब्ध है। केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक राज्य मंत्री श्रीमती अनुप्रिया पटेल ने लोकसभा में लिखित उत्तर में यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण के साथ-साथ सस्ती जेनेरिक दवाओं की पहुंच बढ़ाना सरकार की प्राथमिकता है।

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